भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

दशवाँ प्रकरण । १६१

भी अनेक पदार्थ इसी प्रकार नष्ट और उत्पन्न होते हैं । यदि सब सत्य ही होवें, तब उनका नाश कदापि न हो और नाश अवश्य होता है, इसी से सिद्ध होता है कि सब पदार्थ अनिर्वचनीय मिथ्या हैं और साखी का सत्यकार्यवाद भी असंगत है ॥ ६ ॥

मूलम् । अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ ७ ॥

पदच्छेदः । अलम्, अर्थेन, कामेन, सुकृतेन, अपि, कर्मणा, एभ्यः, संसारकान्तारे, न विश्रान्तम्, अभूत्, मनः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अर्थेन = अर्थ करकेएभ्यः = इन तीनों से
कामेन = कामना करकेसंसारकान्तारे = संसार-रूपी जंगल में
सुकृतेन कर्मणा अपि = सुकृत कर्म करके भीमनः = चित्त
अलम् = बहुत हो चुका हैन विश्रान्तम् = शान्त नहीं
तथा अपि = तो भीअभूत् = होता भया ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! धर्म, अर्थ और काम की इच्छा का त्याग करना ही जीवन्मुक्ति का कारण है और इनमें जो दोष हैं, उनको देखो—