अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
ईश्वरः, सर्वन्निर्माता, न, इह, अन्यः, इति, निश्चयी, अन्तर्गलित सर्वाशः, शान्तः, क्व, अपि, न, सज्जते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वन्निर्माता = | सबका पैदा करनेवाला | $\left.\begin{aligned} अन्तर्गलित \ सर्वाश \end{aligned}\right}=$ | अन्तःकरण में गलित हो गई हैं सब आशाएँ जिसकी |
| इह = | इस संसार में | च = | और |
| ईश्वरः = | ईश्वर है | यस्य आत्मा = | जिसका मन |
| अन्य = | दूसरा कोई | शान्तः = | शान्त हुआ है |
| न = | नहीं है | क्व अपि = | कहीं भी |
| इति = | ऐसा | न = | नहीं |
| निश्चयी = | निश्चय करनेवाला पुरुष | सज्जते = | आसक्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**आपने कहा है कि आत्मा की सत्ता करके भावाभाव-विकार उत्पन्न होते हैं, सो आत्मा दो हैं । एक जीवात्मा है, दूसरा ईश्वरात्मा है । दोनों में से किसकी सत्ता करके भावाभाव विकार उत्पन्न होते हैं ।
**उत्तर—**ईश्वरात्मा की सत्ता करके जगत् भर के पदार्थ उत्पन्न होते हैं । जीवात्मा की सत्ता करके शरीर के नख रोमादिक उत्पन्न होते हैं । क्योंकि वह आत्मा अपने शरीर-मात्र में ही है और इसी कारण परिच्छिन्न है । उसकी सत्ता करके जगत् के पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते हैं, और ईश्वर सर्वत्र व्यापक है, और सारे जगत् से बड़ा है । उसकी उपाधि माया भी बड़ी है, इसी वास्ते सर्वत्र ईश्वर की सत्ता