भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 405 में से

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पृष्ठ 176

ग्यारहवाँ प्रकरण । १६९

पदच्छेदः ।

आपदः, सम्पदः, काले, दैवात्, एव, इति, निश्चयी, तृप्तः, स्वस्थेन्द्रियः, नित्यम्, न, वाञ्छति, न, शोचति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
काले=समय परनित्यमतृप्तः=नित्य संतुष्ट व स्वस्थेन्द्रिय हुआ
आपदः=आपत्तियाँस्वस्थेन्द्रियः
च=औरअप्राप्त वस्तु की इच्छा नहीं करता है
सम्पदः=सम्पत्तियाँन वाञ्छति=
दैवात् एव=दैवयोग से ही होती हैच=और
न=
इति निश्चय=ऐसा निश्चय करनेवाला पुरुषशोचति=नष्ट हुई वस्तु को शोचता है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि ईश्वर ही सर्व जगत् का रचनेवाला माना जावेगा, तब फिर किसी को दरिद्री, किसी को धनी, किसी को दुःखी किसी को सुखी न होना चाहिए । पर ऐसा प्रत्यक्ष देखते हैं, इसलिये ईश्वर में विषम दृष्टि आदिक दोष आते हैं ?

**उत्तर—**हे राजन् ! ईश्वर में दोष तब आवे, जब ईश्वर किन्हीं कर्मों को रचे, सो तो नहीं है; क्योंकि गीता में भी लिखा है—

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १ ॥

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