भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

१७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

थोड़े दिनों के बाद जखम में कीड़े पड़ गये, तब भी महात्मा का चेहरा मैला न हुआ । उसी नगर में थोड़ी दूर पर मंदिर में एक और महात्मा रहते थे । उन्होंने जब उनका हाल सुना, तब एक आदमी की जबानी उन महात्मा को कहला भेजा कि भाई ! जिस मकान में आदमो रहता है, उस मकान में उसको झाड़ू-बुहारू देना आवश्यक होता है । जब ऐसा संदेश उनको पहुँचा, तब उन्होंने जवाब दिया कि महात्माजी से कहना कि जब आप तीर्थों में गये थे और राह में बीसों धर्मशालाओं में रात्रि-भर रहते गये थे, वे धर्मशाले अब गिर पड़े हैं, अब जाकर उनकी मरम्मत करिए। हमको तो शरीर-रूपी धर्मशाला में आयु-रूपी रात्रि भर रहना है। वह रात्रि भी व्यतीत हो गई है । अब इस शरीर-रूपी धर्मशाला की कौन मरम्मत करे । इतना कहकर फिर चुप हो गये । थोड़े दिनों के बाद उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया, ऐसी दशा जीवन्मुक्तों की होती है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्प शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्, अहम्, एव, इति, निश्चयी, निर्विकल्पः, शुचिः, शान्तः, प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥