भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 405 में से

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पृष्ठ 187

१८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्=यहनिश्चयी=निश्चय करनेवाला
विश्वम्=संसारनिर्वासनः=वासना-रहित
नानाश्चर्य्यम्=अनेक आश्चर्य्यवालास्फूर्तिमात्रः=बोध-स्वरूप पुरुष
न किञ्चित्=कुछ नहीं है अर्थात् मिथ्या हैन किञ्चिदिव=व्यवहार-रहित
इति=इस प्रकारशाम्यति=शान्ति को प्राप्त होता है

भावार्थ ।

**प्रश्न—**हे प्रभो ! ब्रह्मज्ञानी के मन के संकल्प कैसे स्वतः नष्ट हो जाते हैं ?

**उत्तर—**जब अधिष्ठान चेतन के साक्षात्कार होने से अध्यस्त वस्तु का बाध हो जाता है अर्थात् आत्मा के साक्षात्कार होने से जब नाना प्रकार के आश्चर्य-रूप विश्व का बाध हो जाता है, तब विद्वान् के मन के सर्व संकल्प दूर हो जाते हैं ।

**प्रश्न—**हे प्रभो ! यदि आत्मा के साक्षात्कार होने से जगत् का बाध अर्थात् नाश हो जाता है, तो फिर पञ्चभूतात्मक जगत् भी न रहता, और जगत् के नाश होने पर विद्वान् के देहादिक भी न रहते, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं, इसी से जाना जाता है कि आत्मा के साक्षात्कार होने पर भी जगत् ज्यों का त्यों बना रहता है ?

**उत्तर—**नाश दो प्रकार का है । एक तो बाध-रूप नाश है, दूसरा निवृत्तिरूप नाश है ।