भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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बारहवाँ प्रकरण । १९१

मूलम् ।

एवमेव कृतं येन सकृतार्थो भवेदसौ ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

एवम्, एव, कृतम्, येन, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ,
एवम्, एव, स्वभावः, यः, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
येन= जिस पुरुष करकेयः= जो
एवम् एव= क्रिया-रहितएवम् एव= ऐसा ही अर्थात् स्वतः ही
स्वरूपम्= स्वरूपस्वभावः= स्वभाववाला है
साधनवशात्= साधनों के वश सेसः असौ= सो वह
कृतम्= किया गया हैकृतार्थः= कृतकृत्य
सः असौ= वह पुरुष भीभवेत्= होता है
कृतार्थः= कृतकृत्यकिंवक्तव्यम्= इसमें कहना ही क्या है
भवेत्= होता है

भावार्थ ।

जिस पुरुष ने इस प्रकार संपूर्ण क्रियाओं से रहित अपने स्वरूप को जान लिया है, वही कृतार्थ अर्थात् जीवन्मुक्त होता है ।

प्रश्न—जीवन्मुक्त का लक्षण क्या है ?
उत्तर—ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धवि-
निर्मुक्तो जीवन्मुक्तः ।