अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 208, कुल 405 में से
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चौदहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाभावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
प्रकृत्या, शून्यचित्तः, यः, प्रमादात्, भावभावनः, निद्रितः, बोधितः, इव, क्षीणसंसरण, हि, सः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः = | जो पुरुष | च = | और |
| प्रकृत्या = | स्वभाव से | निद्रितः = | सोता हुआ |
| शून्यचित्तः = | शून्य चित्त वाला है | बोधितः इव = | जागते हुए के तुल्य है ऐसा |
| च = | पर | स = | वह पुरुष |
| प्रमादात् = | प्रमाद से | क्षीणसंसरणः = | संसार से रहित है ॥ |
| भावभावनः = | विषयों का सेवन करनेवाला है |
भावार्थ ।
इस प्रकरण में जनकजी अपने शान्तिचतुष्टय को कहते हैं ।
जो पुरुष स्वभाव से विषयों में शून्य चित्तवाला है अर्थात् अपने स्वभाव से चित्त के धर्म जो विषयों में राग-