भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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चौदहवाँ प्रकरण । २०९

होता है, सो जिस विद्वान् ने महाकाव्यों करके और भाग- त्यागलक्षणा करके जीव ईश्वर की अभेदता को जान लिया है, वही मुक्त है, उसको मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्दचारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशा, एव, जानते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$अन्तर्विकल्प-\ शून्यस्य = जो अन्तःकरण में विकल्प से शून्य है$\begin{aligned}स्वच्छन्द-\ चारिणः\end{aligned} = स्वतंत्र चलनेवाले की
=और (जो)ताः ताः=उन उन
बहिः=बाहरदशाः=दशाओं को
$भ्रान्तस्य इव = भ्रान्त हुए पुरुष की नाईं है ऐसे$तादृशाः एव = वैसे ही दशावाले पुरुष
जानते=जानते हैं ॥

भावार्थ ।

जिस पुरुष का अन्तःकरण विकल्प अर्थात् संकल्प से रहित है, अर्थात् जिसको कोई भी विषय-वासना भीतर से