अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 216, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 216
चौदहवाँ प्रकरण । २०९
होता है, सो जिस विद्वान् ने महाकाव्यों करके और भाग- त्यागलक्षणा करके जीव ईश्वर की अभेदता को जान लिया है, वही मुक्त है, उसको मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
अन्तर्विकल्पशून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्दचारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशा, एव, जानते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $अन्तर्विकल्प-\ शून्यस्य = जो अन्तःकरण में विकल्प से शून्य है | $\begin{aligned}स्वच्छन्द-\ चारिणः\end{aligned} = स्वतंत्र चलनेवाले की | ||
| च=और (जो) | ताः ताः=उन उन | ||
| बहिः=बाहर | दशाः=दशाओं को | ||
| $भ्रान्तस्य इव = भ्रान्त हुए पुरुष की नाईं है ऐसे | $तादृशाः एव = वैसे ही दशावाले पुरुष | ||
| जानते=जानते हैं ॥ |
भावार्थ ।
जिस पुरुष का अन्तःकरण विकल्प अर्थात् संकल्प से रहित है, अर्थात् जिसको कोई भी विषय-वासना भीतर से