भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 405 में से

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पृष्ठ 218

पन्द्रहवाँ प्रकरण।

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मूलम्।

यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः।

यथातथोपदेशेन, कृतार्थः, सत्त्वबुद्धिमान्, आजीवम्, अपि, जिज्ञासु, परः, तत्र, विमुह्यति ॥

अन्वयः।शब्दार्थ ।अन्वयः।शब्दार्थ ।
सत्त्वबुद्धिमान् =सत्त्वबुद्धिवाला पुरुषआजीवम् =जीवनपर्यन्त
यथातथोपदेशेन =जैसे-जैसे याने थोड़े ही उपदेश सेजिज्ञासुःअपि =जिज्ञासु होता हुआ भी
कृतार्थः =कृतार्थतत्र =उसमें
भवति =होता हैविमुह्यति =मोह को प्राप्त होता है ॥
परः =असत् बुद्धिवाला पुरुष

भावार्थ।

अब तत्त्वोपदेशविंशतिक नामक पंचदश प्रकरण का आरम्भ करते हैं—
अष्टावक्रजी जनकजी की ज्ञानस्थिति के लिये पुनः-पुनः उपदेश करते हैं। क्योंकि 'छांदोग्योपनिषद्' में श्वेतकेतु के प्रति, श्वेतकेतु के पिता ने नव बार आत्मतत्त्व का उपदेश किया है।
प्रथम ज्ञान के अधिकारी और अनधिकारी को दिखाते हैं—