भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२३

संपूर्ण घट-पटादिक पदार्थ जड़ हैं। घट-पटादिक अपने को नहीं जानते हैं और अपने से भिन्न आत्मा को भी नहीं जानते हैं इसी से वे सब जड़ हैं, हे शिष्य ! तुम ज्ञान और चैतन्य-स्वरूप हो ॥ ८ ॥

मूलम् । गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ १ ॥

पदच्छेदः । गुणैः, संवेष्टितः, देहः तिष्ठति, आयाति, याति, च, आत्मा, न, गन्ता, न, आगन्ता, किम्, एनम्, अनुशोचसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
गुणैः=गुणों सेआत्मा=जीवात्मा
संवेष्टितः=लिपटा हुआ=न
देहः=शरीरगन्ता=जानेवाला है
तिष्ठति=स्थित है=न
+ सः=वहआगन्ता=आनेवाला है
आयाति=आता हैकिम्=किस वास्ते
=औरएनम्=इसके निमित्त
याति=जाता हैअनुशोचसि=तू शोचता है ॥

भावार्थ । हे शिष्य ! इन्द्रियादिकों करके संवेष्टित होकर यह लिंग-शरीर इस लोक में स्थित रहता है। फिर कुछ काल के बाद लोकान्तर को चला जाता है। फिर वहाँ से चला आता है। आत्मा न लोकान्तर को, न देशान्तर को जाता है, न वहाँ से आता है और स्थूल शरीर जन्म लेता और