अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ प्रकरण । २२५
में प्रतिबिम्ब, और माया का अधिष्ठान चेतन तीनों का नाम ईश्वर है। जीव और ईश्वर का भेद उपाधियों करके है, वास्तव में भेद नहीं है। जैसे घटाकाश और मठाकाश का उपाधि- कृत भेद है, वैसे जीव और ईश्वर का भी उपाधिकृत भेद है, वास्तव में भेद नहीं है । उपाधियाँ कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं। चेतन नित्य है, सोई चेतन तुम्हारा रूप आप है, ऐसा जानकर तुम शोक करने के योग्य नहीं हो ॥ ९ ॥
मूलम् देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व चवा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १० ॥
पदच्छेदः । देहः, तिष्ठतु, कल्पान्तम्, गच्छतु, अद्य, एव, वा पुनः, क्व, वृद्धिः, क्व, च, वा, हानिः, तव, चिन्मात्ररूपिणः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| पुनः= | चाहे | चिन्मात्र-रूपिणः= | चैतन्य-रूपवाले का |
| देहः= | शरीर | ||
| कल्पान्तम्= | कल्प के अन्त तक | क्व= | कहाँ |
| तिष्ठतु= | स्थिर रहे | वृद्धिः= | वृद्धि है |
| वा= | चाहे | च= | और |
| अद्यएव= | अभी | क्व= | कहाँ |
| गच्छतु= | नाश हो | हानि= | हानि है ॥ |
| तव= | तुझ |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! द्रष्टा द्रव्य से पृथक्