अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवां प्रकरण । २३१
कार्य मृत्तिका-रूप ही जाने जाते हैं । क्योंकि कारण से कार्य का भेद नहीं होता है । जितना नाम का विषय-विकार है, केवल वाणी का कथन-मात्र ही है, केवल मृत्तिका ही सत्य है ॥ १ ॥
यथा सौम्यैकेन लोहमणिना सर्व्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वा-चारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ २ ॥
हे सौम्य ! जैसे स्वर्ण के ज्ञान से जितने कटक कुण्डलादिक्ष उसके कार्य हैं, सब स्वर्ण-रूप ही हैं । क्योंकि कार्य कारण से भिन्न नहीं होता है । और जितने स्वर्ण के कार्य नाम के विषय हैं, वे सब वाणी करके कथन-मात्र मिथ्या हैं । उन सब विषे अनुगत स्वर्ण ही सत्य है ॥ २ ॥
इस तरह हे पुत्र ! अनेक श्रुति-वाक्यों से जब तू बोधित होगा, तब तुझको मालूम होगा कि तू ही कार्य-कारणरूप से स्थित है, तूही सच्चिदानन्द ज्ञान-स्वरूप आत्मा है ॥१४॥
मूलम् ।
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज ।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसंकल्पःसुखीभव ॥ १५ ॥
पदच्छेदः ।
अयम्, सः, अहम्, अयम्, न, अहम्, इति, सन्त्यज, सर्वम्, आत्मा, इति, निश्चित्य, निःसङ्कल्पः, सुखीभव ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अयम् | =यह | अयम् | =यह |
| सः | =वह | अहम् | =मैं |
| अहम् | =मैं | न | =नहीं हूँ |
| अस्मि | =हूँ | इति | =ऐसे |