अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । अहम्, कर्त्ता, इति, अहम्मानमहाकृष्णाहिदंशितः, न, अहम्, कर्त्ता, इति, विश्वासामृतम्, पीत्वा, सुखी, भव ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम्=मैं | न कर्त्ता=नहीं कर्त्ता हूं । | ||
| कर्त्ता=करता हूँ | इति=ऐसे | ||
| इति=ऐसे | विश्वा- } विश्वासारूपी अमृत | ||
| अहंमान- } अहंकार-रूपी अत्यंत | सामृतम् } =को | ||
| महाकृष्णा- } =कृष्ण वर्णवाले सर्प से | पीत्वा=पी करके | ||
| हिदंशितः } दंशित हुआ तू | सुखी=सुखी | ||
| अहम्=मैं | भव=हो ॥ |
भावार्थ । हे जनक ! "अहं कर्त्ता" मैं इस कर्म का कर्त्ता हूँ, एवं मैं इसके फल को भोगूँगा, यह जो अहंकार-रूपी काला सर्प है, इसी करके डसा हुआ, सारा संसार जन्म-मरण-रूपी चक्र में पड़कर भटकता रहता है और तू भी इस अहंकार-रूपी सर्प करके डसा हुआ, अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है। उस अहंकार-रूपी सर्प के विपके उतारने के लिये "नाहं कर्त्ता" मैं कर्त्ता नहीं हूँ, जब ऐसे निश्चयरूपी अमृत को तू पान करेगा, तब तू सुखी होवेगा । अन्यथा किसी प्रकार से भी तू सुखी नहीं हो सकता है ॥८॥
जनकजी कहते हैं कि पूर्वोक्त अमृत को मैं कैसे पान करूँ ? इसके उत्तर को कहते हैं—
मूलम् । एको विशुद्धबुद्धोऽहमिति निश्चयवह्निना । प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥९॥