अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 266, कुल 405 में से
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सत्रहवाँ प्रकरण । २५९
| च=और | धन्यः=धन्य पुरुष वह है |
| तस्य=उसकी | च=जो |
| स्थितौ=स्थिति में | यथाजीविकया=यथाप्राप्त आजी- विका द्वारा |
| द्वेषः=द्वेष | |
| न=नहीं है | यथासुखम्=सुखपूर्वक |
| तस्मात्=इस कारण | आस्ते=रहता है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे पुत्र ! विश्व के लय होने की इच्छा जिस विद्वान् को नहीं है, और विश्व के स्थिर रहने में जिसको द्वेष नहीं है, अर्थात् प्रपञ्च रहे अथवा नष्ट हो जाय, और जो अपने को विश्व का साक्षी अधिष्ठान समझकर स्थित है, वही विद्वान् कृतकृत्य है, धन्य है, पूजने योग्य है ॥७॥
मूलम् ।
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्तेयथासुखम् ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
कृतार्थः, अनेन, ज्ञानेन, इति, एवम्, गलितधीः, कृती, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अनेन=इस | गलितधीः=गलित हुई है बुद्धि जिसकी, ऐसा |
| ज्ञानेन=ज्ञान से | |
| कृतार्थ=मैं कृतार्थ हूँ | कृति=ज्ञानी पुरुष |
| इति एवम्=इस प्रकार | पश्यन्=देखता हुआ |