अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । २८१
दाष्ट्रान्त ।
अज्ञान के वश होकर जो अपने आत्मा को तीर्थों में और पर्वतों में खोजता फिरता है, वह दशवें पुरुष की तरह अपने को नहीं जानता है । जब गुरु उसको उपदेश करता है, तब वह जानता है कि सुख-रूप आत्मा मैं हूँ । इसलिये गुरु और शास्त्र की भी आवश्यकता है ।
तात्पर्य यह है कि जिसने गुरु और शास्त्र के उपदेश को श्रवण करके अपने स्वरूप का निश्चय कर लिया है, उसके अन्तःकरण में फिर मोह-रूपी आवरण कदापि नहीं रहता है, किन्तु वह संसार में शोभा को प्राप्त होता है ।। ६ ।।
मूलम् ।
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः । इति विज्ञाय धीरोहि किमभ्यस्यति बालवत् ॥७॥
पदच्छेदः ।
समस्तम्, कल्पनामात्रम्, आत्मा, मुक्तः, सनातनः, इति, विज्ञाय, धीरः, हि, किम्, अभ्यस्यति, बालवत् ।।
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| समस्तम् = सब जगत् | इति = ऐसा |
| कल्पनामात्रम् = कल्पना-मात्र है | विज्ञाय = ज्ञान करके |
| आत्मा = आत्मा | धीरः = पंडित |
| मुक्तः = मुक्त है | बालवत् = बालकों की नाई |
| च = और | किम् = क्या |
| सनातनः = सनातन है | अभ्यस्यति = अभ्यास करता है ॥ |