भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

२९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । जिसने इस विश्व को अर्थात् जगत् को देखा है, वह यह नहीं कह सकता है कि जगत् है नहीं क्योंकि उसको जगत् होने और न होने की वासनाएँ बनी हैं, और जो निर्वासनिक पुरुष है, वह जगत् को देखता हुआ भी नहीं देखता है । क्योंकि वह सुसुप्ति-युक्त पुरुष की तरह मन के संकल्प और विकल्प से रहित है ।। १५ ।।

मूलम् । येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् । किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ।।१६।।

पदच्छेदः । येन, दृष्टम्, परम्, ब्रह्म, सः, अहम्, ब्रह्म, इति, चिन्त- येत्, किम्, चिन्तयति, निश्चन्तः, द्वितीयम्, यः, न, पश्यति ।।

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
येन=जिस पुरुष द्वारायः=जो पुरुष
परम्=श्रेष्ठनिश्चन्तः=निश्चिन्त हुआ
ब्रह्म=ब्रह्मद्वितीयम्=दूसरे को
दृष्टम्=देखा गया हैन पश्यति=नहीं देखता है
सःअहम्=सो मैं ब्रह्म हूँसः=वह
इति=ऐसाकिं चिन्तयति=क्या चिन्ता करेगा ।।
चिन्तयेत्=विचार करे

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस पुरुष ने सबसे अलग ब्रह्म को