अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 318, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३११
तथाच—न कर्मणा न प्रजया न धनेन ।
कर्मों करके, प्रजा करके, धन करके, पुरुष मोक्ष को कदापि प्राप्त नहीं होता है, परन्तु जिसका अविद्या-मल दूर हो गया है, वह केवल विज्ञान-मात्र करके मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ३६ ॥
मूलम् ।
मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥
पदच्छेदः ।
मूढः, न, आप्नोति, तत्, ब्रह्म, यतः, भवितुम्, इच्छति, अनिच्छन्, अपि, धीरः, हि, परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यतः=जिस कारण | न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है |
| मूढः=अज्ञानी | धीरः=ज्ञानी |
| ब्रह्म=ब्रह्म | हि=निश्चय करके |
| भवितुम्=होने को | अनिच्छन्नपि=नहीं चाहता हुआ भी |
| इच्छति=इच्छा करता है | $\left. परब्रह्मस्वरूप- भाक् \right}=परब्रह्म-स्वरूप का भजनेवाला |
| ततः=उसी कारण | |
| सः=वह | भवति=होता है ॥ |
| तत्=उसको अर्थात् ब्रह्म को |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ चित्त के निरोध करने से ब्रह्म-रूप होने की इच्छा करता है, इसी