अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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पहला प्रकरण । २५
हो जाता है, और लोग अपने-अपने स्वप्नों को देखते ही रहते हैं। अतएव हे राजन् ! अब तू अज्ञान-रूपी निद्रा से जाग, और अपने ज्ञान-स्वरूप को प्राप्त होकर सुख-पूर्वक संसार में विचर ॥१०॥
**प्रश्न—**जब सारा जगत् रज्जु में सर्प की तरह कल्पित है, और मिथ्या है, तब फिर बन्ध और मोक्ष पुरुष को कैसे हो सकते हैं ?
मूलम् ।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीय सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥
पदच्छेदः ।
मुक्ताभिमानी, मुक्तः, हि बद्धः बद्धाभिमानी, अपि, किंवदन्ती, इह, सत्या, इयम्, या, गतिः, सा गति, भवेत् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| मुक्ताभिमानी=मुक्ति का अभिमानी | किंवदन्ती=लोक-वाद |
| मुक्त=मुक्त है | सत्या=सत्य है कि |
| बद्धाभिमानी=बद्ध का अभिमानी | या=जैसी |
| बद्ध=बद्ध है | मतिः=मति है |
| हि=क्योंकि | सा=वैसी ही |
| इह=इस संसार में | गतिः=गति |
| इयम्=यह | भवेत्=होती है |
भावार्थ ।
हे जनक ! बन्ध का कारण अभिमान है—
ब्राह्मणोऽहम्, क्षत्रियोऽहम्, वैश्योऽहम्, शूद्रोऽहम् ।