भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहःशान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥१२॥

पदच्छेदः ।

आत्मा, साक्षी, विभुः, पूर्णः, एकः, मुक्तः, चित्, अक्रियः,
असंगः, निस्पृहः, शान्तः, भ्रमात्, संसारवान्, इव ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्माअक्रियः = क्रिया-रहित है
साक्षी = साक्षी हैअसंगः = संग-रहित है
विभुः = व्यापक हैनिःस्पृहः = इच्छा-रहित है
पूर्णः = पूर्ण हैशान्तः = शान्त है
एकः = एक हैभ्रमात् = भ्रम के कारण
मुक्तः = मुक्त हैसंसारवान् = संसारवाला
चित् = चैतन्य-रूप हैइव = भासता है

भावार्थ ।

हे जनक ! बन्ध और मोक्ष दोनों अवास्तविक हैं और केवल अपने स्वरूप की अज्ञानता से देहादिकों में अभिमान करके, जीव अपने को बन्धायमान करके, मुक्त होने की इच्छा करता है । वास्तव में न उसमें बन्ध है और न मोक्ष है । जीव-आत्मा है, एक है, पूर्ण है, मुक्त है, असंग है, निःस्पृह है और शान्त है । भ्रम करके संसारवाला भान होता है । वास्तव में, उसमें संसार तीनों कालों में नहीं है, इसमें एक दृष्टांत कहते हैं—

अष्टावक्र गीता · पृष्ठ 35, कुल 405 में से · BharatKosha