अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 384, कुल 405 में से
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उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७७
मूलम् ।
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेककता ।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेककता,
क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्वमहिम्न, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | च | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | अर्थः | = अर्थ है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| धर्मः | = धर्म है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | द्वैतम् | = द्वैत है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| कामः | = काम है ? | क्व | = कहाँ |
| अद्वैतम् | = अद्वैत है ? |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि मेरे को धर्म कहाँ है ? और काम कहाँ है ? मैंने धर्म, अर्थ, और काम को अपने हृदय से निकाल दिया है । क्योंकि ये सब विनाशी हैं, और जो मैं अपनी महिमा में स्थित हूँ, तो मेरे को विवेक कहाँ ? विवेक से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, और चेतन आत्मा में जो विश्रान्ति को प्राप्त हुआ है, उसको द्वैत और अद्वैत से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ।