अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
साकारम्, अनृतम्, विद्धि, निराकारम्, तु, निश्चलम्, एतत्तत्त्वोपदेशेन, न, पुनः, भवसम्भवः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| साकारम् = | शरीरादिकों को | $\left.\begin{matrix} एतत्तत्त्वो- \ पदेशेन \end{matrix}\right}$ = | इस यथार्थ उपदेश से |
| अनृतम् = | मिथ्या | पुनः = | फिर |
| विद्धि = | जान | भवसम्भवः = | संसार में उत्पत्ति |
| निराकारम् = | निराकार आत्म-तत्त्व की | न = | नहीं |
| निश्चलम् = | निश्चल नित्य | भवति = | होती है |
| विद्धि = | जान |
भावार्थ ।
हे जनक ! साकार जो शरीरादिक हैं, उनको तू मिथ्या जान । जो मिथ्या होकर बन्ध का हेतु होता है, वही विष के योग्य त्यागने योग्य भी होता है । इसी में एक दृष्टान्त कहते हैं—
एक बनिये के घर में लड़का नहीं होता था । एक दिन रात्रि के समय वह पलँग पर अपनी स्त्री के साथ सो रहा था । उसकी स्त्री ने उस बनिये से कहा कि यदि परमेश्वर हमको एक लड़का दे देवे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । बनिया थोड़ा सा पीछे हटा और कहा कि उस लड़के को यहाँ बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । वह थोड़ासा और पीछे हटकर कहने लगा कि उसको भी बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ सुलावेंगे । फिर पीछे हटकर यह कहता ही था कि