अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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दूसरा प्रकरण । ४३
बोध-स्वरूप अर्थात् ज्ञान-स्वरूप होकर, इतने काल तक देह और आत्मा के अविवेक करके दुःखी होता रहा। आज से हे गुरो ! आपकी कृपा करके मैं आत्मानन्द अनुभव को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १ ॥
मूलम् । यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत् । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन ॥ २ ॥
पदच्छेदः । यथा, प्रकाशयामि, एकः, देहम्, एनम्, तथा, जगत्, अतः, मम, जगत्, सर्वम्, अथवा, न च, किञ्चन ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यथा=जैसे | अन्तः=इसलिये |
| एनम्=इस | मम=मेरा |
| देहम्=देह को | सर्वम्=सम्पूर्ण |
| एकः=अकेला ही | जगत्=संसार है |
| प्रकाशयामि=मैं प्रकाश करता हूँ | अथवा=या |
| तथा=वैसे ही | + मम=मेरा |
| जगत्=संसार को भी | किञ्चन=कुछ भी |
| प्रकाशयामि=प्रकाश करता हूँ | न=नहीं है ॥ |
भावार्थ । पूर्व वाक्य करके जनकजी ने मोह की महिमा को कहा—अब इस वाक्य करके गुरु की कृपा से जो उनको देह और आत्मा का विवेक ज्ञान हुआ है, उसको सहित युक्ति के कथन करते हैं—