अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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दूसरा प्रकरण । ५३
में रजत असत् प्रतीत होता है—वैसे ही अज्ञान करके मेरे स्वप्रकाश आत्मा में असत् जगत् प्रतीत हो रहा है, यही बड़ा भारी आश्चर्य है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुम्भोज़ले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
मत्तः, विनिर्गतम्, विश्वम्, मयि, एव, लयम्, एष्यति, मृदि, कुम्भः, जले, वीचिः, कनके, कटकम्, यथा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मत्तः | =मुझ से | मृदि | =मिट्टी में |
| विनिर्गतम् | =उत्पन्न हुआ | कुम्भ | =घड़ा |
| इदम् | =यह | जले | =जल में |
| विश्वम् | =संसार | वाचिः | =लहर |
| मयि | =मुझमें | कनके | =स्वर्ण में |
| लयम् | =लय को | कटकम् | =भूषण |
| एष्यति | =प्राप्त होगा | $\left. लय यान्ति \right}$ | =लय होते हैं ॥ |
| यथा | =जैसे |
भावार्थ ।
जैसे घट मृत्तिका का कार्य है अर्थात् मृत्तिका से ही उत्पन्न होता है, और फिर फूटकर मृत्तिका में ही लय हो जाता है—वैसे ही जगत् भी प्रकृति का कार्य है अर्थात् प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लय हो जाता है । चेतन आत्मा से न जगत् उत्पन्न होता है, और न उसमें लय होता है, क्योंकि जगत् जड़ और आत्मा चेतन