भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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दूसरा प्रकरण । ६९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है किन संवृत्तम्=नहीं वर्तता है
जनसमूहे=जीवों के बीच मेंतस्मात्=तब
अपि=भीक्व=कैसे
मम=मुझअहम्=मैं
पश्यतः=देखते हुए कारतिम्=मोह को
अरण्यम् इव=अरण्यवत्करवाणि=करूँ ॥
द्वैतम्=द्वैत

भावार्थ

पूर्ववाले वाक्य द्वारा जनकजी ने कहा कि स्वर्गादिकों के साथ मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है । अब इस वाक्य करके कहते हैं कि इस लोक के साथ भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है ।

जनकजी कहते हैं कि हे प्रभो ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं द्वैत को देखता भी हूँ, तब भी जनों का जो समूह-रूपी द्वैत वन की तरह उत्पन्न हुआ है, उसके बीच में होता हुआ भी उसके साथ मुझको कोई प्रीति नहीं है, क्योंकि मैंने उसको मिथ्या जान लिया है । मिथ्या वस्तु के साथ ज्ञानवान् प्रीति को नहीं करते हैं । अज्ञानी मिथ्या पदार्थों के साथ प्रीति करते हैं । इतना ही ज्ञानी और अज्ञानी का भेद है ॥ २१ ॥

मूलम् ।

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव हि मे बंध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २२ ॥