अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 8, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 8
श्रीपरमात्मने नमः ।
अष्टावक्र-गीता
भाषा-टीका-सहित
पहला प्रकरण ।
मूलम् ।
जनक उवाच ।
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
कथम्, ज्ञानम्, अवाप्नोति, कथम्, मुक्तिः, भविष्यति, वैराग्यम्, च, कथम्, प्राप्तम्, एतत्, ब्रूहि, मम, प्रभो ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| प्रभो=हे स्वामिन् ! | च=और |
| कथम्=कैसे | वैराग्यम्=वैराग्य |
| + पुरुषः=पुरुष | कथम्=कैसे |
| ज्ञानम्=ज्ञान को | प्राप्तम्=प्राप्त |
| अवाप्नोति=प्राप्त होता है | भविष्यति=होवेगा |
| + च=और | एतत्=इसको |
| मुक्तिः=मुक्ति | मम=मेरे प्रति |
| कथम्=कैसे | ब्रूहि=कहिए ॥ |
| भविष्यति=होवेगी |
भावार्थ ।
राजा जनकजी अष्टावक्रजी से प्रथम तीन प्रश्नों को पूछते हैं—