भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 405 में से

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पृष्ठ 86

तीसरा प्रकरण । ७९

के संग्रह करने में कैसे प्रीति होती है ? अर्थात् आत्मज्ञानी होकर फिर भी तू धनादिकों में प्रीतिवाला दिखाई पड़ता है, इसमें क्या कारण हैं ? ॥ १ ॥

मुनि के प्रश्न के उत्तर को, मुनि से सुनने की इच्छा करके, उससे आप ही प्रश्न पूछते हैं—

मूलम् ।

आत्माऽऽज्ञानादहो प्रीतिर्विषय भ्रमगोचरे ।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

आत्माऽऽज्ञानात्, अहो, प्रीतिः, विषयभ्रमगोचरे, शुक्तेः, अज्ञानतः, लोभः, यथा, रजतविभ्रमे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है कियथा=जैसे
आत्माऽऽज्ञानात्=आत्मा के अज्ञान सेशुक्तेः=सीपी के
अज्ञानतः=अज्ञान से
$\begin{matrix} विषयभ्रम \ गोचर \end{matrix}$=विषय के भ्रम के होने पररजतविभ्रमे=रजत की भ्रांति में
प्रीतिः=प्रीति होती हैलोभः=लोभ होता है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**हे भगवन् ! आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर धनादिकों के संग्रह करने में क्या दोष है ?

**उत्तर—**हे शिष्य ! विषयों में अर्थात् स्त्री पुत्र धनादिकों में जो प्रीति होती है, वह आत्मा के स्वरूप के अज्ञान

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