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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

बीसवाँ प्रकरण । ३१७

भावार्थ ।

शिव-रूप अर्थात् कल्याण रूप उपाधि से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे लिये उपदेश कहाँ है ? क्योंकि उपदेश जो होता है, अपने से भिन्न को होता है, सो अपने से भिन्न तो कोई भी नहीं है, इस वास्ते शास्त्र-गुरु-रूपी उपदेश कभी नहीं है, और शिष्यभाव तथा गुरुभाव भी नहीं है, क्योंकि ये सभी को ले करके ही होते हैं ॥ १३ ॥

मूलम् ।

क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकंकवचद्वयम् ।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, च, अस्ति, क्व, च, वा, न, अस्ति, क्व, अस्ति, च, एकम्, क्व, च, द्वयम्, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, किञ्चित्, न, उत्तिष्ठते, मम, ॥ १४ ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
क्व=कहाँक्व=कहाँ
अस्ति=अस्ति है ?द्वयम्=दो है ?
=औरअत्र=इसमें
क्व=कहाँबहुना=बहुत
नास्ति=नास्ति है ?उक्तेन=कहने से
=औरकिम्=क्या प्रयोजन है ?
क्व=कहाँमम=मुझको
एकम्=एककिञ्चित्=कोई वस्तु
अस्ति=है ?=नहीं
=औरउत्तिष्ठते=प्रकाश करता है ॥

३९८ अष्टावक्र गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुझमें अस्ति अर्थात् है, और नास्ति अर्थात् नहीं है, यह भी स्फुरण नहीं होता है । क्योंकि असत्य की अपेक्षा से 'अस्ति' व्यवहार होता है, और सत्य की अपेक्षा से 'नास्ति' व्यवहार होता है, सो मेरे में व्यवहार के अभाव से दोनों नहीं हैं । न एकपना है, न द्वैतपना है । बहुत कथन करने से क्या प्रयोजन है, चैतन्यस्वरूप में कुछ भी नहीं बनता है ॥ १४ ॥

इति श्रीबाबूजालिमसिंहकृताष्टावक्रगीताभाषाटीकायां जीवन्मुक्तचतुर्दशकं नाम विंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २० ॥