आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Ashvalayana Grihyasutra Hindi
महर्षि आश्वलायन (टीकाकार: हरदत्त आचार्य) द्वारा
स्रोत: Asvalayana Grihya Sutram with Anavila Commentary by Haradatta (उद्गम)
DevanagariHindipublished292 पृष्ठ
पृष्ठ 273, कुल 292 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 273
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
५
| सूत्राणि. | पृष्ठम्. | सूत्राणि. | पृष्ठम्. |
|---|---|---|---|
| कस्य ब्रह्मचार्यसि | ७८ | चतुर्थं संहाय सौ | १११ |
| कामं कृष्णमारो | २०९ | चतुर्थे गर्भमासे | ५७ |
| कामं तु व्रीहियव | ३५ | चतुर्भिः सूक्तैश्चत | २१२ |
| काम्या इतराः | ३७ | चतुष्पथाद् विप्र | २० |
| कालश्च | ८८ | चन्द्रमा मे ब्रह्मा | ९१ |
| किं पिबसि किं पिब | ५५ | चन्द्रमास्ते ब्रह्मा | ९२ |
| कुमारं जातं पुरा | ६० | चरवः | १५२ |
| कुलमग्रे परीक्षेत | १८ | चरितव्रतः सूर्याविदे | ३२ |
| कृताकृतं केशवं | ८८ | चरितव्रताय मेधा | ८६ |
| कृताकृतमाज्य | १३ | चैत्ययज्ञे प्राक् | ५१ |
| केशशब्दे तु इम | ७० | छित्त्वा वैकम् | १८० |
| केशश्मश्रुलोम | ७१ | जपित्वामिष्टे होता | ९१ |
| केशश्मश्रुलोम | १७४ | जानुमात्रं कर्तं खा | १२९ |
| क्षीरोदकेन शमी | १८८ | जायोपेयेत्येके | १५० |
| क्षुत्वा जृम्भित्वा | १५४ | जीमूतस्येव भव | १६८ |
| क्षुरतेजो निमृजेद् | ६९ | जीवं रुदन्तीति | ३० |
| क्षेत्रं प्रकर्षयेदुत्त | १३५ | ज्ञातौ चासपिण्डे | १८७ |
| क्षेत्रस्यानुवातं | १३५ | ज्यायान् ज्यायान् वान | ११० |
| क्षेत्राच्चेदुभयतः स | १९ | तं चतुष्पथे न्युप्य | ११० |
| गणानासामुपति- | १३६ | तं वह्यमानमनु | १८४ |
| गर्भाष्टमे वा | ७२ | तं दीपयमाना | १९२ |
| गाः प्रतिष्ठमाना | १३६ | तं पन्नदतं वृषी | २०९ |
| गार्हपत्यश्चेत् पूर्वे | १८३ | तच्छमीशाखयो | १३१ |
| गुरवे प्रसक्ष्यमा | १६४ | तत् सर्वसमृद्धम् | १२८ |
| गुरुणाभिमृष्टा अ | १९० | तत्स॑वितुर्वृ॑णीमह | ८८ |
| गुरौ चासपिण्डे | १८६ | तत् सहस्रसीतं | १३१ |
| गोमिथुनं दक्षिणा | ७१ | तथाज्यभागौ | १३ |
| गोमिथुनं दत्त्वोपय | २१ | तथोत्तमे आहुती | २७ |
| गोष्ठात् पशुमती | १९ | तथोत्सर्गे | १५० |
| ग्रहणान्तं वा | ८२ | तदाचार्याय वेद | ८४ |
| ग्रामकामा अन्नय | १७२ | तदेपाभियज्ञ | ९५ |
| घृतौदनं तेजस्कामः | ६५ | तद्वरन्ते सर्पीः | २१३ |
| घोषवदाद्यन्तर | ६२ | तद्यदग्नौ जुहोति | १३८ |
| चतसृषु चतसृषु | २११ | तद्दो दिवो दुहि | १२६ |