अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1027, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस से वे अनेक शक्तियों वाले इंद्र से मिल कर उन्हें प्रसन्न करती रहें. हे यजमान! इस के बाद तू अपने राज्य पर सुशोभित हो जाएगा. (१) ता अस्य पृश्नायुवः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः. प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्रं हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (२) पृश्नि नाम की गाएं इस सोमरस का संस्कार कर रही हैं. इंद्र की ये गाएं उन के बाणों और वज्र को प्रेरणा देती हैं. हे यजमान! इन रात्रियों के बाद तू अपने राज्य पर प्रतिष्ठित होगा. (२) ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः. व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (३) वाणियां हवि के द्वारा इंद्र का पूजन करती हैं तथा यजमान के महान व्रत इंद्र से मिलते हैं. हे यजमान! इन रात्रियों के बाद तू अपने राज्य पर प्रतिष्ठित होगा. (३) सूक्त-११० देवता—इंद्र इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (१) सेवा के योग्य इस यज्ञ में हमारी वाणियां सोमरस से युक्त हो कर इंद्र की स्तुति करती हुई उन की पूजा करें. (१) यस्मिन् विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त संसदः. इन्द्रं सुते हवामहे.. (२) विभूतिमयी सभी सभाएं जिन्हें प्राप्त होती हैं, उन इंद्र को उस समय बुलाते हैं, जब सोमरस तैयार हो जाता है. (२) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमन्त. तमिद् वर्धन्तु नो गिरः.. (३) यह ज्ञान देने वाला यज्ञ त्रिकद्रुकों ने आरंभ किया. हमारी वाणियां इस यज्ञ की वृद्धि करें. (३) सूक्त-१११ देवता—इंद्र यत् सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये. यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः.. (१) हे इंद्र! त्रित और आप्य यज्ञ में जो तुम हर्षित होते हो, उस हर्ष का कारण जल पूर्ण सोमरस ही है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*