भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

प्रकार मैं तुझे वृद्धावस्था से बांधता हूं. अर्थात् तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाता हूं. तुझे जन्म लेते ही अकाल में मृत्यु ने अपने फंदे में कस लिया है. उस फंदे को बृहस्पति ब्रह्मा के हाथों के द्वारा कटवा दें. (८) सूक्त-१२ देवता—शाला, वास्तोष्पति इहैव ध्रुवां नि मिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठाति घृतमुक्षमाणा. तां त्वा शाले सर्ववीराः सुवीरा अरिष्टवीरा उप सं चरेम.. (१) मैं इसी प्रदेश में खंभों आदि के कारण स्थिर रहने वाली शाला बनाता हूं. वह शाला मुझे अभिमत फल देती हुई कुशलतापूर्वक स्थिर रहे. हे शाला! मैं अनेक पुत्रपौत्रों, शोभन गुणों वाली संतान एवं रोग आदि बाधाओं से हीन परिवार वाला हो कर तुझ में निवास करूं. (१) इहैव ध्रुवा प्रति तिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनूतावती. ऊर्जस्वती घृतवती पयस्वत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय.. (२) हे शाला! तू बहुत से घोड़ों, गायों, प्रिय बालकों की मधुर वाणी, पर्याप्त अन्न, घृत एवं दूध से पूर्ण हो कर इसी प्रदेश में स्थिर हो और हमारे महान कल्याण के लिए प्रयत्नशील बन. (२) धरुण्यसि शाले बृहच्छन्दाः पूतिधान्या. आ त्वा वत्सो गमेदा कुमार आ धेनवः सायमास्पन्दमानाः.. (३) हे शाला! तू बहुत से भोगों को धारण करने वाली है. अनेक वेद मंत्रों से और पके होने के कारण सुगंधित बने विविध प्रकार के अन्नों से युक्त तुझ में बछड़े और बालक आएं तथा गाएं संध्या काल में थनों से दूध टपकाती हुई आएं. (३) इमां शालां सविता वायुरिन्द्रो बृहस्पतिर्नि मिनोतु प्रजानन्. उक्षन्तूद्ना मरुतो घृतेन भगो नो राजा नि कृषिं तनोतु.. (४) इंद्र और बृहस्पति खंभों को स्थापित कर के इस शाला का निर्माण करें. मरुत् इस शाला को जल से सींचें तथा भग देव इस के आसपास की भूमि को कृषि के योग्य बनाएं. (४) मानस्य पत्नि शरणा स्योना देवी देवेभिर्निमितास्यग्रे. तृणं वसाना सुमना असस्त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः.. (५) हे शाला! तू धान्य आदि का पोषण करने वाली, सुखकरी, रक्षिका एवं तेजस्विनी है. देवों ने सृष्टि के आरंभ में तेरा निर्माण किया था. तिनकों से ढकी हुई तू उत्तम आशाओं वाली हो कर हमें पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान कर. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 125, कुल 1063 में से · BharatKosha