अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस तेज से जल में प्राणी तेजस्वी बनते हैं अथवा जिस तेज से आकाश में गंधर्व आदि तेजस्वी बनते हैं तथा सृष्टि के आदि में जिस तेज के कारण इंद्र आदि ने देवत्व प्राप्त किया, हे अग्नि, उस संपूर्ण तेज से इस समय मुझे तेजस्वी बनाओ. (३) यत् ते वर्चो जातवेदो बृहद् भवत्याहुतेः. यावत् सूर्यस्य वर्च आसुरस्य च हस्तिनः. तावन्मे अश्विना वर्च आ धत्तां पुष्करस्रजा.. (४) हे जन्म लेने वाले प्राणियों के ज्ञाता तथा आहुतियों द्वारा हवन किए जाते हुए अग्नि देव! तुम में जितना तेज है, सूर्य में जितना तेज है तथा असुरों के हाथों में जितना तेज है, उतना ही तेज कमल की माला से सुशोभित अश्विनीकुमार मुझ में धारण करें. (४) यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते. तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्भ्रस्तिवर्चसम्.. (५) चारों दिशाएं जितने स्थान को व्याप्त करती हैं तथा रूप को ग्रहण करने वाले नेत्र जितने नक्षत्रों को देखते हैं, परम ऐश्वर्य वाले इंद्र का असाधारण चिह्न तथा पूर्वोक्त देवों का तेज हमें प्राप्त हो. (५) हस्ती मृगाणां सुषदामतिष्ठावान् बभूव हि. तस्य भगेन वर्चसा ऽ भि षिञ्चामि मामहम्.. (६) वन में स्वेच्छा से रहने वाले हरिण आदि पशुओं के मध्य जंगली हाथी अपने बल की अधिकता के कारण राजा होता है. उस हाथी के भाग्य रूपी तेज से मैं अपनेआप को सींचता हूं. (६) सूक्त-२३ देवता—योनि येन वेहद् बभूविथ नाशयामसि तत् त्वत्. इदं तदन्यत्र त्वदप दूरे नि दध्मसि.. (१) हे स्त्री! जिस पाप से जनित रोग के कारण तू बांझ हुई है, उस पाप को हम तुझ से दूर करते हैं. यह पाप रोग तुझे दुबारा न हो जाए, इसलिए हम इसे दूर देश में पहुंचाते हैं. (१) आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान् बाण इवेषुधिम्. आ वीरो ऽ त्र जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः.. (२) हे स्त्री! बाण जिस प्रकार स्वाभाविक रूप से तरकश में पहुंच जाता है, उसी प्रकार पुरुष के वीर्य से युक्त गर्भ तेरे जननांग में पहुंचे. वह गर्भ दस मास के पश्चात पुत्र के रूप में परिवर्तित हो कर तथा सशक्त बन कर जन्म ले. (२)