अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंइमा याः पञ्च प्रदिशो मानवीः पञ्च कृष्टयः. वृष्टे शापं नदीरिवेह स्फातिं समावहान्.. (३) पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और इन की मध्यवर्ती—ये पांच दिशाएं तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद—ये पांच जातियां इस यजमान के धनधान्य की उसी प्रकार वृद्धि करें, जिस प्रकार वर्षा का जल प्रवाह में पड़े हुए जलों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है. (३) उदुत्सं शतधारं सहस्रधारमक्षितम्. एवास्माकेदं धान्यं सहस्रधारमक्षितम्.. (४) जल की उत्पत्ति का स्थान सौ अथवा हजार धाराओं वाला होने पर भी कभी क्षीण नहीं होता है, इसी प्रकार हमारा यह धान्य अनेक प्रकार से हजार धाराओं वाला हो कर क्षय रहित बने. (४) शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर. कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह.. (५) हे सौ हाथों वाले देव! तुम अपनी भुजाओं से धन एकत्र करो तथा हजार हाथों से ला कर हमें धन दो. इस के पश्चात अपने द्वारा दिए हुए धन से मुझे समृद्ध बनाओ. (५) तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणां चतस्रो गृहपत्नयाः. तासां या स्फातिमत्तमा तया त्वाभि मृशामसि.. (६) विश्वावसु आदि गंधर्वों की संपन्नता के कारण हैं—उन की तीन कलाएं. उन की चार अप्सरा रूपी पत्नियां हैं. हे धान्य! पत्नियों में जो अतिशय समृद्ध है, उस से हम तेरा स्पर्श कराते हैं. (६) उपोहश्च समूहश्च क्षत्तारौ ते प्रजापते. ताविहा वहतां स्फातिं बहुं भूमानमक्षितम्.. (७) हे प्रजापति! उपोह नाम का देव और धन की वृद्धि करने वाले देवों का समूह—ये दोनों तुम्हारे सारथी हैं. अनेक प्रकार के तथा क्षय रहित धन धान्य को एवं समृद्धि को ये हमारे समीप लाएं. (७) सूक्त-२५ देवता—कामेषु उत्तुदस्तवोत् तुदतु मा धृथाः शयने स्वे. इषुः कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*