अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा कांड सूक्त-१ देवता—बृहस्पति ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः. स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१) सत्, चित, आनंद और सारे विश्व का कारण ब्रह्म सब से पहले सूर्य रूप में प्रकट हुआ जो पूर्व दिशा में उत्पन्न होता है तथा अपने तेज से सारे जगत् को व्याप्त करता है. यह प्रकाश और वर्षा का कारण सूर्यात्मक तेज सभी दिशाओं से आरंभ हो कर अपने शोभन प्रकाश को फैलाता है. सत् और असत् के उत्पत्ति स्थान के ज्ञान का तथा धरती, आकाश आदि का ज्ञान प्रकट करने वाला वही सूर्यात्मक तेज है. (१) इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः. तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे.. (२) संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले पिता प्रजापति ब्रह्मा हैं. उन से प्राप्त और नाद रूप में सभी प्राणियों में व्याप्त वाणी सारे संसार के व्यवहारों की स्वामिनी है. ये प्रथम शब्द से वाच्य सूर्यात्मक तेज अर्थात् ब्रह्म को स्तुति रूप में प्राप्त हों. (२) प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति. ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ.. (३) इस प्रपंच के कारण, हितकारी एवं निरावरण ज्ञान से सारे जगत् को जानते हुए जो देव सर्वप्रथम उत्पन्न हुए, वे इंद्र आदि सभी देवों के जन्मों का वर्णन करते हैं. प्रथम उत्पन्न देव ने सब के कारण रूप ब्रह्म के मध्य भाग से, नीचे वाले भाग से और ऊपर वाले भाग से वेदों का उद्धार किया. इस के पश्चात देवों को हवि के रूप में अन्न मिला. (३) स हि दिवः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्. महान् मही अस्कभायद् वि जातो द्यां सद्म पार्थिवं च रजः.. (४) सूर्य के रूप में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए देव आकाश में कारण रूप में तथा पृथ्वी में सत्य रूप में स्थित हैं एवं उन्होंने धरती व आकाश को अविनाशी रूप में स्थापित किया. धरती और आकाश को व्याप्त कर के वर्तमान उस प्रथम देव ने धरती और आकाश को स्थापित किया है. वह इन दोनों के मध्य में सूर्य के रूप में उत्पन्न हुआ है तथा आकाश और पृथ्वी को ebook converter DEMO Watermarks*