अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसन्मन्त्राद् दुष्ष्वप्न्याद् दुष्कृताच्छमलादुत. दुर्हर्दश्चक्षुषो घोरात् तस्मान्नः पाह्याञ्जन.. (६) हे अंजन मणि! अभिचार संबंधी बुरे मंत्रों से उत्पन्न दुःख से, बुरे स्वप्नों से प्राप्त दुःख से, पूर्वजन्म में किए हुए पाप से, दूसरे के द्वारा किए हुए पाप से, दूषित मन से तथा दूसरों के क्रूर नेत्र से हमारी रक्षा करो. (६) इदं विद्वानाञ्जन सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्. सनेयमश्वं गामहमात्मानं तव पूरुष.. (७) हे अंजन! तेरी महिमा को जानता हुआ मैं यथार्थ ही कहूंगा, असत्य नहीं बोलूंगा. तुम्हारा दास बन कर मैं घोड़ा, गाय एवं जीवन को प्राप्त करूं. (७) त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः. वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता.. (८) कठिनता से जीवित रखने वाला ज्वर, सन्निपात और सर्प का विष—ये तीन दास के समान अंजन मणि के वश में हैं. अर्थात् अंजनमणि इन के विकार को दूर कर देती है. पर्वतों में सब से प्राचीन त्रिककुद तुम्हारा पिता है. (८) यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि. यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः.. (९) हिमालय पर्वत के ऊपर के भाग में त्रिककुद नाम का पर्वत है. वहां उत्पन्न अंजन वृक्ष सभी राक्षसों और सभी राक्षसियों को नष्ट करे. (९) यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे. उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन.. (१०) हे अंजन! तू मनुष्यों द्वारा चाहे त्रिककुद पर्वत से संबंधित कहा जाता है अथवा यमुना से संबंधित. तेरे त्रैककुद और यामुन दोनों ही नाम कल्याणकारी हैं. तू अपने दोनों नामों के द्वारा हमारी रक्षा कर. (१०) सूक्त-१० देवता—शंखमणि, तृशन वाताज्जातो अन्तरिक्षाद् विद्युतो ज्योतिषस्परि. स नो हिरण्यजाः शङ्खः कृशनः पात्वंहसः.. (१) वायु से उत्पन्न, अंतरिक्ष से उत्पन्न, बिजली से उत्पन्न, ज्योति मंडल के ऊपर के स्थान से उत्पन्न तथा स्वर्ग से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (१) ebook converter DEMO Watermarks*