भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 1063 में से

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जिस अग्नि के शासन में सारा जगत् वर्तमान है, अंतरिक्ष में ग्रह, नक्षत्र आदि प्रकाशित हैं, उत्पन्न हुए और उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी जिन के शासन में हैं, मैं उन अग्नि की स्तुति करता हूं तथा फल की कामना से बार-बार हवन करता हूं. ऐसे अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२४ देवता—इंद्र इन्द्रस्य मन्महे शश्वदिदस्य मन्महे वृत्रघ्न स्तोमा उप मेम आगुः. यो दाशुषः सुकृतो हवमेति स नो मुञ्चत्वंहसः.. (१) मैं बारबार इंद्र का महत्त्व स्वीकार करता हूं. वृत्र की हत्या करने वाले इंद्र के ये स्तोत्र मेरे समीप आ कर मुझे स्तोता बनाते हैं. जो इंद्र चरु, पुरोडाश आदि देने वाले एवं उत्तम यज्ञ करने वाले यजमान का आह्वान स्वीकार करते हैं, वह इंद्र मुझे पाप से बचाएं. (१) य उग्रीणामुग्रबाहुर्ययुर्यो दानवानां बलमारुरोज. येन जिताः सिन्धवो येन गावः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२) जो इंद्र ऊपर हाथ उठा कर शत्रु सेनाओं को भगा देते हैं, जिन्होंने दानवों के बल को सभी ओर से नष्ट कर दिया है, जिन इंद्र ने मेघों में स्थित जलों को जीता था तथा जिन्होंने पणियों के द्वारा चुराई हुई गाएं प्राप्त कीं, वह हमें पाप से छुड़ाएं. (२) यश्चर्षणिप्रो वृषभः स्वर्विद् यस्मै ग्रावाणः प्रवदन्ति नृम्णम्. यस्याध्वरः सप्तहोता मदिष्ठः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (३) जो इंद्र मनुष्यों को मनचाहा फल दे कर पूर्ण करने वाले, बैल के समान शक्तिशाली और स्वर्ग प्राप्त करने वाले हैं, जिन इंद्र के लिए पत्थर सोमरस प्रदान करते हैं एवं सात होताओं से युक्त जिन इंद्र से संबंधित सोमयाग प्रसन्न करने वाला होता है, वह हमें पाप से बचाएं. (३) यस्य वशास ऋषभास उक्षणो यस्मै मीयन्ते स्वरवः स्वर्विदे. यस्मै शुक्रः पवते ब्रह्मशुम्भितः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४) जिन इंद्र के यज्ञ के निमित्त बांझ गाएं, बैल एवं सांड़ लाए जाते हैं, स्वर्ग प्राप्त करने वाले जिन इंद्र के निमित्त यज्ञों में गांठों वाले खंभे गाड़े जाते हैं तथा जिन इंद्र के निमित्त निचोड़ने के साधनों से युक्त एवं निर्मल सोमरस छाना जाता है, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (४) यस्य जुष्टिं सोमिनः कामयन्ते यं हवन्त इषुमन्तं गविष्टी. यस्मिन्नर्कः शिश्रिये यस्मिन्नोजः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५) सोमरस वाले यजमान जिन की प्रीति की कामना करते हैं तथा जिन आयुध धारी इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*