अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी प्राणियों के आधार बने हुए द्यावा पृथ्वी सारे जगत् में प्रविष्ट हैं. हे दिव्य, उत्तम सौभाग्य वाले एवं व्याप्त द्यावा पृथ्वी! मेरे सुख के कारण बनो एवं मुझे पाप से बचाओ. (२) असन्तापे सुतपसौ हुवे ऽ हमुर्वी गम्भीरे कविभिर्नमस्ये. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (३) संताप रहित, उत्तम ताप वाले, गंभीर एवं विद्वानों द्वारा नमस्कार के योग्य द्यावा पृथ्वी, मेरे सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (३) ये अमृतं बिभृथो ये हवींषि ये स्त्रोत्या बिभृथो ये मनुष्यान्. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (४) जो द्यावा पृथ्वी अमृत को धारण करते हैं तथा जो चरु, पुरोडाश आदि को, नदियों को एवं मनुष्यों को धारण करते हैं, वे मेरे लिए सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (४) ये उस्रिया बिभृथो ये वनस्पतीन् ययोर्वा विश्वा भुवनान्यन्तः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (५) जो द्यावा पृथ्वी सभी गायों को धारण करते हैं, जो सभी वृक्षों को धारण करते हैं तथा जिन दोनों के मध्य समस्त भवन हैं, वे द्यावा पृथ्वी, मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (५) ये कीलालेन तर्पयथो ये घृतेन याभ्यामृते न किं चन शक्नुवन्तिः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (६) जो द्यावा पृथ्वी अन्न एवं घृत के द्वारा समस्त विश्व को तृप्त करते हैं, जिन दोनों के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकते, वे द्यावा पृथ्वी मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (६) यन्मेदमभिशोचति येनयेन वा कृतं पौरुषेयान्न दैवात्. स्तौमि द्यावापृथिवी नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चतमंहसः.. (७) यह पाप और उस का फल मुझे सभी ओर से जलाता है एवं इसी के कारण बारबार पाप किए जाते हैं. पुरुषों से प्रेरित पाप के समान देव कर्मों से संबंधित पाप भी मुझे जलाता है. मैं फल की कामना से द्यावा पृथ्वी की स्तुति करता हूं. ये दोनों मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२७ देवता—मरुत् मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु. आशूनिव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*