भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 1063 में से

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ही धारण किया है. (१) अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्. तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तः.. (२) मैं ही दिखाई देने वाले विश्व का नियंत्रण करने वाली, उपासकों को फल के रूप में धन दिलाने वाली, परब्रह्म का साक्षात्कार करने वाली तथा यज्ञ के योग्य देवों में प्रमुख हूं. अनेक भाग से प्रपंचों में स्थित मुझ को उपासकों को फल देने वाले देव बहुत से साधनों में निर्धारित करते हैं. (२) अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवानामुत मानुषाणाम्. यं कामये तन्तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (३) मैं ही स्वयं अनुभव किए गए ब्रह्म के विषय में लोकहित की दृष्टि से कह रही हूं. वह ब्रह्म देवों और मनुष्यों का प्रिय है. मैं जिसजिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूं, उसउस को बलवान बना देती हूं. मैं उसे ब्रह्म, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूं. (३) मया सो ऽ न्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्. अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धेयं ते वदामि.. (४) भोग करने वाला जो मनुष्य अन्न खाता है, वह मुझ शक्तिरूपा के द्वारा ही अन्न खाता है. जो मनुष्य विश्व को देखता है, सांस लेता है अथवा सुनता है, ये सब व्यापार शक्ति स्थानों में मैं ही करती हूं. मुझे न मानते हुए वे संसार में क्षीण होते हैं. हे सखा! मेरी कही हुई बात सुन. मैं तुझे श्रद्धा के योग्य ब्रह्म का उपदेश करती हूं. (४) अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ. अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (५) मैं ब्राह्मणों के द्वेषी एवं हिंसकों को मारने के लिए महादेव का धनुष तानती हूं अर्थात् उस की डोरी खींचती हूं. मैं ही स्तोता जन के लिए संग्राम करती हूं तथा द्यावा और पृथ्वी में मैं ही प्रविष्ट हूं. (५) अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्. अहं दधामि द्रविणा हविष्मते सुप्राव्या ३ यजमानाय सुन्वते.. (६) निचोड़ने योग्य सोमरस को अथवा शत्रुओं का विनाश करने एवं स्वर्ग में स्थित सोम को मैं ही धारण करती हूं. त्वष्टा, पूषा और भव को भी मैं ही धारण करती हूं. हवि लिए हुए, देवों को हवि प्राप्त कराने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए यज्ञ के फल के रूप में धन मैं ही धारण करती हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*