भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 201

सूक्त-३४ देवता—ब्रह्मौदन ब्रह्मास्य शीर्षं बृहदस्य पृष्ठं वामदेव्यमुदरमोदनस्य. छन्दांसि पक्षौ मुखमस्य सत्यं विष्टारी जातस्तपसो ऽ धि यज्ञः.. (१) दिए जाते हुए ब्रह्मौदन की स्तुति की जा रही है—"ब्रह्म अर्थात् रथंतर साम इस ओदन का शीश एवं बृहत् साम इस की पीठ है. वामदेव ऋषि द्वारा देखा गया साम इस का पेट तथा गायत्री आदि छंद इस के पक्ष अर्थात् दोनों कोखें हैं. सत्य नाम का साम इस का मुख है. विस्तार वाला ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ ब्रह्म के भीतरी भाग से उत्पन्न हुआ है." (१) अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्. नैषां शिश्नं प्र दहति जातवेदाः स्वर्गेलोके बहु स्त्रैणमेषाम्.. (२) सत्र यज्ञ के करने वाले अमृतमय, वायु के द्वारा पवित्र, निर्मल, एवं दीप्तिशाली होते हैं और देहावसान के पश्चात ज्योतिर्मय लोक को जाते हैं. स्वर्गलोक में वर्तमान ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ करने वालों की इंद्रियों को अग्नि नहीं जलाती. इन्हें भोगने के लिए स्त्रियों का समूह प्राप्त होता है. (२) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवर्तिः सचते कदा चन. आस्ते यम उप याति देवान्त्सं गन्धवैर्मदते सोम्येभिः.. (३) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, उन के समीप दरिद्रता कभी नहीं आती. वह यजमान देहांत के पश्चात यमराज के द्वारा पूजित हो कर सुख से निवास करता है तथा यम की अनुमति पा कर देवों के समीप पहुंचता है. वह सोमरस के योग्य विश्वावसु आदि गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहता है. (३) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परि मुष्णाति रेतः. रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वाति दिवः समेति.. (४) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, यमराज उन के वीर्य का अपहरण नहीं करते. रथ द्वारा जाने योग्य भूलोक में वे जब तक जीवित रहते हैं, तब तक रथ पर बैठ कर चलते हैं या पक्षों वाले हो कर अंतरिक्ष के ऊपर वर्तमान लोक को पार कर के भोगों से युक्त होते हैं. (४) एष यज्ञानां विततो वहिष्ठो विष्टारिणं पक्त्वा दिवमा विवेश. आण्डीकं कुमुदं सं तनोति बिसं शालूकं शफको मुलाली. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*