अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं. अराति को नमस्कार हो. (३) सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे. वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु.. (४) मैं देवों का आह्वान करने वाले यज्ञों में उस वाणी का उच्चारण करता हूं, जो उन्हें प्रसन्न करने वाली है. हम सब सरस्वती, अनुमति और भगदेव की शरण प्राप्त करते हैं और उन्हें बुलाते हैं. (४) यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा. श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा.. (५) मन से उत्पन्न सरस्वती की वाणी के द्वारा मैं जिस वस्तु को पाने की प्रार्थना करता हूं, वह शक्तिशाली सोमदेव की श्रद्धा द्वारा दी हुई प्राप्त हो. (५) मा वनिं मा वाचं नो वीत्सीरुभाविन्द्राग्नी आ भरतां नो वसूनि. सर्वे नो अद्य दित्सन्तो ऽ रातिं प्रति हर्यत.. (६) हे अराति! तू हमारी वाणी और भक्ति को अवरुद्ध मत कर. इंद्र और अग्नि हमें धन प्रदान करें तथा वे इस समय हमारे शत्रुओं के अनुकूल न हों. (६) परो ऽ पेह्यसमृद्धे वि ते हेतिं नयामसि. वेद त्वाहं निमीवन्तीं नितुदन्तीमराते. (७) हे अराति! मैं जानता हूं कि तू दुर्बल बनाने वाला और पीड़ा देने वाला है. इस कारण तू मुझ से दूर रह. मैं तेरी विनाशक शक्ति को दूर कर सकता हूं. (७) उत नग्ना बोभुवती स्वप्रया सचसे जनम्. अराते चित्तं वीर्त्सन्त्याकूतिं पुरुषस्य च.. (८) हे अराति! तू मनुष्यों की कामनाओं को असफल करता है तथा उन्हें सदा प्रभाव के रूप में प्राप्त होता है. (८) या महती महोन्माना विश्वा आशा व्यानशे. तस्यै हिरण्यकेश्यै निर्ऋत्या अकरं नमः.. (९) असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९) हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही. ebook converter DEMO Watermarks*