अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरो. तुम देवों के दूत, ज्ञानवान और क्रांतदर्शी हो. (१) तनूनपात् पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व. मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२) हे शरीररक्षक एवं उत्तम जिह्वा वाले अग्नि! तुम सत्यलोक को प्राप्त कराने वाले मार्गों को मधुर बना कर उन का आस्वादन करो एवं मेरे यज्ञ को बढ़ाते हुए इसे देवों को प्राप्त कराओ. (२) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्च याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः. त्वं देवानामासि यह्व होता स एनान् यक्षीषितो यजीयान्.. (३) हे अग्नि! तुम पूज्य व वंदना करने योग्य हो. तुम में भलीभांति हवन किया जाता है. हमारे इस यज्ञ कर्म में तुम वसुओं के सहित आओ. तुम देवों के होता हो. तुम हमारी प्रेरणा से देवों की पूजा करो. (३) प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्. व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४) वेदी रूपी भूमि को ढकने वाले आह्वनीय अग्नि पूर्वाह्न में विस्तृत होते हैं. अग्नि अन्य ज्योतियों की अपेक्षा श्रेष्ठ, धनवान तथा पृथ्वी को सुख देने वाले हैं. (४) व्यचस्वतीरुरुविया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः. देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (५) अग्नि की ज्वाला हवि को वहन करने वाली और व्याधियों को रोकने वाली है. इस कारण वह द्वार के समान है. हे अग्नि की प्रकाशमान ज्वाला! जिस प्रकार स्त्रियां पतियों का आदर करती है, उसी प्रकार तुम देवों को सुख देने वाली बनो. तुम हवि को व्याप्त करने वाली हो. (५) आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ. दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६) अग्नि की दीप्ति उषा और यज्ञ की दीप्ति से युक्त है. वह यज्ञों का संपादन करती एवं देवों से संयुक्त होती है. वह दिव्य, परस्पर मिलने वाली एवं उत्तम दीप्ति यजमान के हेतु अग्नि की स्थापना करे. (६) दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै. प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)