भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 275

छठा कांड सूक्त-१ देवता—सविता दोषो गाय बृहद् गाय द्युमद्धेहि. आथर्वण स्तुहि देवं सवितारम्.. (१) हे अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ्ऋषि! स्तुति के योग्य एवं विशाल साम मंत्रों का रातदिन अर्थात् हर समय गुणगान करो तथा उन के द्वारा हमें धन युक्त बनाओ. हे स्तुति करने वाले दध्यङ् ऋषि! तुम अपने नाम मंत्रों द्वारा दानादि गुणों से संपन्न सविता देव की स्तुति करो. (१) तमु ष्टुहि यो अन्तः सिन्धौ सूनुः. सत्यस्य युवानमद्रोधवाचं सुशेवम्.. (२) हे स्तुति करने वाले! उन्हीं सविता देव की स्तुति करो जो ब्रह्म के प्रथम पुत्र हैं एवं जो प्रवाहशील सागर से उदित होते दिखाई देते हैं. वे नित्य तरुण, रात्रि के अंधकार का विनाश करने वाले एवं शोभन वचन उच्चारण करने वाले हैं. (२) स घा नो देवः सविता साविषदमृतानि भूरि. उभे सुष्टुती सुगातवे.. (३) वे ही सविता देव हमें अमर बनाने के साधन यज्ञों अधिक मात्रा में देवों को प्राप्त कराएं एवं हमें मृत्यु विरोधी बल प्रदान करें. वे सविता देव हमें शोभन स्तुति के साधन दोनों प्रकार के रथंतर साम गान हेतु प्रेरित करें. (३) सूक्त-२ देवता—सोम इन्द्राय सोममृत्विजः सुनोता च धावत. स्तोतुर्यो वचः शृणवद्ववं च मे.. (१) हे अध्वर्यु आदि ऋत्विजो! इंद्र के लिए सोम को निचोड़ो और निचोड़े गए सोम का दशापवित्र के द्वारा सभी प्रकार शोधन करो. वे इंद्र मुझ स्तोता के स्तुति लक्षण आह्वान को सुनें तथा आदरपूर्वक जानें. (१) आ यं विशन्तीन्दवो वयो न वृक्षमन्धसः. विरप्शिन् वि मृधो जहि रक्षस्विनीः.. (२) जिस प्रकार पक्षी अपने निवास वाले वृक्ष पर स्वेच्छा से शीघ्र पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*