भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 292

प्राण वायु ग्रहण करने के पश्चात अपान वायु छोड़ते हुए इस प्राणिसमूह के शरीर में सूर्य की प्रभा वर्तमान है. वह महान सूर्य स्वर्ग तथा सभी ऊपर वाले लोकों को प्रकाशित करता है. (२) त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः.. (३) दिवस एवं रात के अवयव तीस मुहूर्त तेज के स्थान हैं और इस सूर्य की चमक से विराजमान रहते हैं. तीनों वेदों के रूप वाली वाणी भी सूर्य के आश्रय में ही रहती है. (३) सूक्त-३२ देवता—अग्नि अन्तर्दावे जुहुता स्वे ३ तद् यातुधानक्षयणं घृतेन. आराद् रक्षांसि प्रति दह त्वमग्ने न नो गृहाणामुप तीतपासि.. (१) हे ऋत्विजो! राक्षसों का विनाश करने वाले इस हवि को घी के साथ अग्नि में हवन करो. हे अग्नि! उपद्रव करने वाले इन राक्षसों को भस्म करो तथा हमारे घरों को संताप युक्त मत करो. (१) रुद्रो वो ग्रीवा अशरैत् पिशाचाः पृष्टीर्वो ऽ पि शृणातु यातुधानाः. वीरुद् वो विश्वतोवीर्या यमेन समजीगमत्.. (२) हे पिशाचो! तुम्हारी गरदन को रुद्र देव काटें. हे यातुधानो! तुम्हारी पीठ की हड्डियों का ही विनाश करें. सभी प्रकार की शक्ति वाली ओषधि तुम यातुधानों को मृत्यु से मिला दे. (२) अभयं मित्रावरुणाविहास्तु नो ऽ र्चिषात्रिणो नुदतं प्रतीचः. मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्.. (३) हे मित्र और वरुण! इस देश में हमें भय नहीं रहे. तुम अपने तेज से मानव भक्षी राक्षसों को हम से पराङ्मुख करो. दूर भागे हुए वे मुझ ज्ञानी को प्राप्त न करें तथा मेरी आवास भूमि को प्राप्त न कर सकें. वे एक दूसरे पर प्रहार करते हुए मृत्यु को प्राप्त करें. (३) सूक्त-३३ देवता—इंद्र यस्येदमा रजो युजस्तुजे जना वनं स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (१) हे मनुष्यो! जिस इंद्र का प्रसन्नताकारक प्रकाश शत्रु विनाश के लिए तत्पर करता है, उस इंद्र के रमणीय एवं सेवा के योग्य तेज को तुम ग्रहण करो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*