भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

अव ज्यामिव धन्वनो मन्युं तनोमि ते हृदः. यथा संमनसौ भूत्वा सखायाविव सचावहै.. (१) हे पुरुष! धनुर्धारी जिस प्रकार धनुष पर चढ़ी हुई डोरी को उतारता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय से क्रोध को दूर करता हूं. (१) सखायाविव सचावहा अव मन्युं तनोमि ते. अधस्ते अश्मनो मन्युमुपास्यामसि यो गुरु.. (२) मित्रों के समान हम एकमत हो कर रक्षा कार्य करें. हे क्रुद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को भारी पत्थर के नीचे दबाता हूं. (२) अभि तिष्ठामि ते मन्युं पाष्ण्यां प्रपदेन च. यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि.. (३) हे वृद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को अपने अधीन करने के लिए पैरों के ऊपर और नीचे के भागों से खड़ा होता हूं. जिस प्रकार तुम परवश हो कर मेरा विरोध करने में समर्थ न बनो तथा जिस प्रकार तुम मेरे मन के अनुकूल बनो, मैं वैसा ही उपाय करता हूं. (३) सूक्त-४३ देवता—मन्युशमन अयं दर्भो विमन्युकः स्वाय चारणाय च. मन्योर्विमन्युकस्यायं मन्युशमन उच्यते.. (१) यह दर्भ अर्थात् कुश अपनी जातियों और शत्रुओं के क्रोध के विनाश का कारण है. यह क्रोध करने वाले शत्रु तथा परमार्थ रूप से क्रोधाविष्ट आत्मीय का क्रोध शांत करने का उपाय कहा जाता है. (१) अयं यो भूरिमूलः समुद्रमवतिष्ठति. दर्भः पृथिव्या उत्थितो मन्युशमन उच्यते.. (२) अधिक जड़ों वाला यह कुश अधिक जल वाले भाग में स्थित है. पृथ्वी पर ऊपर की ओर उठा हुआ कुश क्रोध शांत करने वाला बताया जाता है. (२) वि ते हनव्यां शरणिं वि ते मुख्यां नयामसि. यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि.. (३) हे पुरुष! हम तेरी उस ध्वनि को नम्र बनाते हैं, जो क्रोध व्यक्त करने वाली है. हम तेरे मुख की उस ध्वनि को भी शांत बनाते हैं जो क्रोध को उत्पन्न करती है. तात्पर्य यह है कि हम तेरा क्रोध शांत करते हैं. तू हमारे विरोध में बोलने में समर्थ न हो. इस प्रकार हम तेरा मन ebook converter DEMO Watermarks*