भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 1063 में से

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है. बुरे स्वप्नों के निमित्त उन सभी अशोभन पापों को अग्नि देव हम से दूर करें. (२) यदिन्द्र ब्रह्मणस्पते ऽ पि मृषा चरामसि. प्रचेता न आङ्गिरसो दुरितात् पात्वंहसः.. (३) हे इंद्र और ब्रह्मणस्पति! दुःख के निमित्त जिस पाप के कारण हम स्वप्न में अत्यधिक निंदनीय आचरण करते हैं, उस दुःख देने वाले पाप के आंगिरस मंत्रों के अधिष्ठाता देव वरुण हमारी रक्षा करें. (३) सूक्त-४६ देवता—दुःस्वप्न विनाश यो न जीवो ऽ सि न मृतो देवानामामृतगर्भो ऽ सि स्वप्न. वरुणानी ते माता यमः पिताररुर्नामासि.. (१) हे स्वप्न! न तुम जीवित हो, न मृत हो. तुम इंद्रियों के अधिष्ठाता अग्नि आदि देवों के अमृत से पूर्ण हो. वरुण की पत्नी तेरी माता और यम तेरे पिता हैं. तेरा नाम दुःख देने वाला अशुभ अररु है. (१) विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः. अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्षप्न्यात् पाहि.. (२) हे स्वप्न के अभिमानी देव! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम वरुणानी आदि देव पत्नियों के पुत्र एवं यम के साधन हो, इसलिए तुम अंतक और मृत्यु हो. हे स्वप्न! हम तुझे उसी प्रकार जानते हैं. तू बुरे स्वप्न से उत्पन्न दुःख से हमारी रक्षा कर. (२) यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति. एवा दुष्षप्न्यं सर्वं द्विषते सं नयामसि.. (३) जैसे गाय के खुर आदि दूषित अंगों को काट कर दूर कर देते हैं, जैसे ऋणी मनुष्य साहूकार को धन देता है, उसी प्रकार बुरे स्वप्न से उत्पन्न सभी भयों को मैं उस मनुष्य को देता हूं जो मुझ से द्वेष करता है. (३) सूक्त-४७ देवता—अग्नि अग्निः प्रातःसवने पात्वस्मान् वैश्वानरो विश्वकृद् विश्वशंभूः. स नः पावको द्रविणे दधात्वायुष्मन्तः सहभक्षाः स्याम.. (१) सभी प्राणियों का हित करने वाले, जगत् के कर्ता एवं सब को सुख देने वाले अग्नि प्रातःसवन नामक सोम यज्ञ में हमारी रक्षा करें. सब को पवित्र करने वाले अग्नि देव हमें यज्ञ ebook converter DEMO Watermarks*

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