भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 345

अश्लोणा अङ्गैर्ह्रुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान्.. (३) यज्ञ आदि करने वाले सहृदय जन अपने शरीर के ज्वर आदि रोगों को त्याग कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रसन्न होते हैं. हम भी कुष्ठ आदि रोगों से हीन अंगों के द्वारा सरल गति से चलते हुए स्वर्गलोक में अपने पिता, माता और पुत्रों से मिलें. (३) सूक्त-१२१ देवता—अग्नि आदि विषाण पाशान् वि ष्या ऽ ध्यस्मद् य उत्तमा अधमा वारुणा ये. दुष्ष्वप्न्यं दुरितं निः ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (१) हे बंधन की देवी निर्ऋति! हमारे शरीर के मार्गों को बांधने वाले फंदे की रस्सियों को हम से छुड़ाती हुई हमें मुक्त करो. जो पाश उत्तम, अधम और वरुण से संबंधित हैं, उन्हें हम से अलग करो. बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप के फंदों को भी हम से अलग करो. इन फंदों से छूट कर हम पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले लोकों को प्राप्त करें. (१) यद् दारुणि बध्यसे यच्च रज्जवां यद् भूम्यां बध्यसे यच्च वाचा. अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुद्निन्याति सुकृतस्य लोकम्.. (२) हे पुरुष! तुम काठ के बंधन में, रस्सी में अथवा धरती के गड्ढे में राजा की आज्ञा से बांधे गए हो. यह गार्हपत्य अग्नि तुम्हें उन बंधनों से छुड़ा कर वह लोक प्राप्त कराएं, जो उत्तम कर्म करने के फल के रूप में मिलता है. (२) उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके. प्रेहामृतस्य यच्छतां प्रैतु बद्धकमोचनम्.. (३) विचृत अर्थात् मूल नक्षत्र में उदय या उत्पन्न होने वाली विचृत नाम की तारिकाएं इस बंधे हुए पुरुष को मरने से बचाएं तथा साथ ही बंधन से मुक्त करें. (३) वि जिहीष्व लोकं कृणु बन्धान्मुञ्चासि बद्धकम्. योन्या इव प्रच्युतो गर्भः पथः सर्वा अनु क्षिय.. (४) हे बंधन से संबंधित देवता! तुम अनेक प्रकार से आओ और इस स्थान पर बंधे हुए पुरुष को उसके बंधन से छुड़ाओ. हे पुरुष! जिस प्रकार माता के गर्भ से बच्चा बाहर निकल आता है, उसी प्रकार तू बंधन से छूट कर स्वच्छंद रूप से सभी मार्गों पर चल. (४) सूक्त-१२२ देवता—विश्वकर्मा एतं भागं परि ददामि विद्वान् विश्वकर्मन् प्रथमजा ऋतस्य. अस्माभिर्दत्तं चरसः परस्तादच्छिन्नं तन्तुमनु सं तरेम.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*