भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 363

अस्ति नु तस्मादोजीयो यद्विहव्येनेजिरे.. (४) यजमानों ने पुरुष रूप हवि से पुरुषमेध नामक यज्ञ का विस्तार किया. उस में जो ओजस्वी एवं सारवान है, उसे हवि के रूप में देखा. (४) मुग्धा देवा उत शुना ऽ यजन्तोत गोरङ्गैः पुरुधा ऽ यजन्त. य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (५) कार्य और अकार्य के विवेक से हीन यजमानों ने कुत्ते के द्वारा यज्ञ किया तथा गाय के अंगों के द्वारा भी अनेक बार यज्ञ किया. जो इस यज्ञ करने योग्य परमात्मा को मन से जानता है, वह गुरु हमें बताओ. उसे यहीं और इसी समय परमात्मा का स्वरूप बताओ. (५) सूक्त-६ देवता—अदिति अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः. विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (१) खंड न होने योग्य जो पृथ्वी एवं देवमाता है, वही स्वर्ग और अंतरिक्ष है. वही संसार की निर्मात्री माता और उत्पन्न करने वाला पिता है. वही माता और पिता से उत्पन्न पुत्र है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषाद—ये पांच जातियों वाले जन भी अदिति हैं. प्रजाओं की उत्पत्ति और जन्म का अधिकरण भी अदिति है. (१) महीमू षु मातरं सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हवामहे. तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.. (२) महती एवं शोभन कर्मों वाली माता को सत्य और यज्ञ का पालन करने वाली माता के उद्देश्य से हम अपनी रक्षा के लिए यज्ञ करते हैं. अधिक बल एवं शक्ति संपन्न, विनाश रहित, अति दूर तक जाने वाली, शोभन सुख वाली एवं उत्तम कर्मों से प्रसन्न होने वाली देव माता अदिति को हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (२) सूक्त-७ देवता—अदिति सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१) भलीभांति रक्षा करती हुई, विस्तीर्ण, पहुंचने योग्य, पाप रहित, सुख वाली सुखमय कर्मों की प्रेरणा एवं अखंडनीय दैवी नाव में हम सवार हों. उस शोभन डांडों वाली एवं छिद्र रहित दैवी नाव पर अपराध न करने वाले हम कल्याण प्राप्त करने के लिए सवार हों. (१) वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. ebook converter DEMO Watermarks*