भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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निर्वाचन, शाला निर्माण, कृषि तथा पशु पालन का विवरण है. चतुर्थ कांड में ब्रह्मविद्या, विषनाशन, राज्याभिषेक, वृष्टि, पापमोचन तथा ब्रह्मोदन का वर्णन है. पंचम कांड में मुख्यत ब्रह्म विद्या और कृत्या राक्षसी के परिहार से संबद्ध मंत्र हैं. षष्ठ कांड में दुःस्वप्ननाशन और अन्न समृद्धि के मंत्र हैं. सप्तम कांड आत्मा का वर्णन करता है. अष्टम कांड में मुख्यतया विराट् ब्रह्म का वर्णन है. नवम कांड में मधु विद्या, पंचोदन, अज, अतिथि सत्कार, गो महिमा एवं यक्ष्मा का नाश—ये विषय हैं. दशम कांड में कृत्या निवारण, ब्रह्मविद्या, शत्रु नाश के लिए वरणमणि, सर्पविषनाशन एवं ज्येष्ठ विषनाशन का वर्णन है. एकादश कांड में ब्रह्मोदन, रुद्र तथा ब्रह्मचर्य का वर्णन है. द्वादश कांड में प्रसिद्ध पृथ्वी सूक्त है, जिस में भूमि का महत्त्व वर्णित है. त्रयोदश कांड में पूर्णतयाः अध्यात्म का प्रकरण है. चतुर्दश कांड में विवाह संस्कार से संबद्ध कार्यों का वर्णन है. पंचदश कांड में व्रात्य ब्रह्म का गद्य में वर्णन है. षोडश कांड में दुःखमोचन के लिए गद्यात्मक मंत्र हैं. सप्तदश कांड में अभ्युदय के लिए प्रार्थना है. अष्टादश कांड पितृमेध से संबद्ध है. एकोनविंश कांड में विविध विषय हैं—यक्ष, नक्षत्र, विविध मणियां, छंदों के नाम, राष्ट्र का वर्णन, काल का महत्त्व. विंश कांड में सोमयाग का वर्णन तथा इंद्र की स्तुति है. इस के अंत में 10 सूक्त ‘कुंताय सूक्त’ के नाम से प्रसिद्ध हैं. अथर्ववेद का महत्त्व अथर्ववेद की विषयवस्तु शेष तीनों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद से भिन्न है. इन तीनों वेदों में यज्ञों, देवस्तुतियों, स्वर्ग प्राप्ति आदि को महत्त्व दिया गया है. इस के विपरीत अथर्ववेद में वर्णित ओषधियां, जादू, टोनाटोटका आदि लौकिक जीवन से संबंधित हैं. बहुत समय तक तीन वेदों की मान्यता रही थी. इस विषय में एक सूक्ति प्रस्तुत है— त्रयोऽग्न्यस्त्रययो वेदास्त्रयोदेवास्त्रयोगुणाः त्रयो दंडि प्रबंधश्च त्रिषुलोकेषुविश्रुताः.. अर्थात तीन अग्नियां, तीन वेद, तीन गुण और दंडी कवि के तीन प्रबंध-तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं. अथर्ववेद की भाषा भी शेष तीन वेदों की भाषा से सरल है. इन दृष्टियों से स्पष्ट होता है कि अथर्ववेद की रचना बाद में हुई है. वैसे यज्ञों में अथर्ववेद को विशेष महत्त्व प्राप्त है. यज्ञ में चार वेदों से संबंधित चार ऋत्विज होते हैं. उन में प्रधान ऋत्विज् ब्रह्मा कहलाता है. वह अपनी देखरेख में यज्ञ कार्य कराता है और शेष ऋत्विजों को निर्देश देता है. ब्रह्मा एक प्रकार से यज्ञ का अध्यक्ष अथवा प्रधान होता है. यह ब्रह्मा अथर्ववेद का ही ज्ञाता होता है. आचार्य बलदेव प्रसाद उपाध्याय के अनुसार— अथर्ववेद का विषय विवेचन अन्य वेदों की अपेक्षा नितांत विलक्षण है. इस में वर्णित विषयों का तीन प्रकार से विभाजन किया जा ebook converter DEMO Watermarks*