अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त-११० देवता—ब्रह्मचारी अपक्रामन् पौरुषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः. प्रणीतीरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह.. (१) हे ब्रह्मचारी! तू पुरुषों के हितकारी लौकिक कर्म त्याग कर देव संबंधी वाक्य अर्थात् वेद मंत्रों के स्वाध्याय को स्वीकार करता हुआ संयमी बन तथा सभी ब्रह्मचारियों के साथ निवास कर. (१) सूक्त-१११ देवता—जातवेद यदस्मृति चकृम किं चिदग्न उपारिम चरणे जातवेदः. ततः पाहि त्वं नः प्रचेतः शुभे सखिभ्यो अमृतत्वमस्तु नः.. (१) हे अग्नि देव! हम ने तुम्हारे स्मरण से रहित जो कर्म किया है तथा इस यज्ञ के अनुष्ठान में जो कमी रह गई है, हे उत्तम कर्म जानने वाले अग्नि देव! तुम उस पाप से हमारी रक्षा करो. इस के पश्चात मैं अपने प्रिय व्यक्तियों के शोभन यज्ञ कर्म में संलग्न रहूं. (१) सूक्त-११२ देवता—सूर्य अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः. आपः समुद्रिया धारास्तास्ते शल्यमसिम्रसन्.. (१) कश्यप नामक प्रधान सूर्य से संबंधित सात व्यापक किरणों वाले आरोग्य आदि सूर्य हैं. वे आकाश में उत्पन्न धारा रूपी जलों को आकाश से नीचे उतारते हैं. हे रोगी! वे जल शल्य के समान तेरे यक्ष्मा रोग को नष्ट कर दें. (१) सूक्त-११३ देवता—अग्नि यो न स्तायद् दिप्सति यो न आविः स्वो विद्वानरणो वा नो अग्ने. प्रतीच्येत्वरणी दत्वती तान् मैषामग्ने वास्तु भून्मो अपत्यम्.. (१) हे अग्नि! जो शत्रु हमें प्रच्छन्न रूप से मारना चाहता है, जो शत्रु हमें प्रकाश रूप में मारना चाहता है तथा दूसरे को बाधा पहुंचाने के उपाय जानता हुआ आत्मीय बंधु हमें मारना चाहता है - इन तीनों को दांतों वाली तथा कष्टकारिणी राक्षसी प्राप्त हो. अर्थात् वह अपने दांतों से खाने के लिए उन के समीप आए. हे अग्नि! उक्त तीनों का घर एवं संतान नष्ट हो जाए. (१) यो नः सुप्तानूजाग्रतो वाभिदासात् तिष्ठतो वा चरतो जातवेदः. ebook converter DEMO Watermarks*