अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह हुवे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (६) जीवन देने वाली, रोष रहित, सेवन करने वाले की रक्षिका, रोग को पराजित करने वाली एवं शक्ति संपन्न जीवंती अर्थात् ग्वारपाठा नामक जड़ीबूटी को व्याधियों के नाश का इच्छुक मैं इस शांति कर्म के लिए बुलाता हूं. वह इस समीपवर्ती पुरुष का रोग निवारण करे. (६) अधि ब्रूहि मा रभथाः सृजेमं तवैव सन्त्सर्वहाया इहास्तु. भवाशर्वौ मृडतं शर्म यच्छतमपसिध्य दुरितं धत्तमायुः.. (७) हे मृत्यु! तुम इस के पक्षपात का वचन कहो. अर्थात् बोलो कि यह मेरा है. तुम इसे मारने का आरंभ मत करो. यह तुम्हारा ही जन है. यह भूलोक में सर्वत्र गति वाला बने. हे भव और शर्व! तुम इसे सुखी करो तथा इस के कल्याण का प्रयत्न करो. तुम इस के व्याधि रूपी पाप को निकाल कर इस में आयु को स्थापित करो. (७) अस्मै मृत्यो अधि ब्रूहीमं दयस्वोदितो ३ यमेतु. अरिष्टः सर्वाङ्गः सुश्रुज्जरसा शतहायन आत्मना भुजमश्रुताम्.. (८) हे मृत्यु! यह तुम से भयभीत है. तुम इसे बताओ कि यह तुम्हारी कृपा के योग्य है. तुम इस पर दया करो. यह अहिंसित, चक्षु आदि सभी अंगों से युक्त, उत्तम श्रोता एवं वृद्धावस्था पा कर सौ वर्षों तक अन्य जनों की अपेक्षा अधिक भोग प्राप्त करे. (८) देवानां हेतिः परि त्वा वृणक्तु पारयामि त्वा रजस उत् त्वा मृत्योरपीपरम्. आरादग्निं क्रव्यादं निरूहं जीवातवे ते परिधिं दधामि.. (९) रुद्र आदि देवों का आयुध तुम्हारी हिंसा न करे. मैं मूर्च्छा लक्षण वाले आवरण से तुम्हें अलग करता हूं. मैं मृत्यु के पाश से तुम्हारा उद्धार करता हूं. मैं मांस खाने वाली अग्नि को तुझ से दूर निकालता हूं तथा तेरे जीवन के लिए परकोटे के रूप में यज्ञ की अग्नि को धारण करता हूं. (९) यत् ते नियानं रजसं मृत्यो अनवधर्ष्यम्. पथ इमं तस्माद् रक्षन्तो ब्रह्मास्मै वर्म कृण्मसि.. (१०) हे मृत्यु! तेरे रजोमय मार्ग को कोई धर्षित नहीं कर सकता. उस मार्ग से मैं इस मृत्यु के समीप पहुंचे हुए पुरुष के लिए मनन रूपी कवच पहनाता हूं. (१०) कृणोमि ते प्राणापानौ जरां मृत्युं दीर्घमायुः स्वस्ति. वैवस्वतेन प्रहितान् यमदूतांश्चरतो ऽ प सेधामि सर्वान्.. (११) हे आयु को चाहने वाले पुरुष! मैं तेरे शरीर में प्राण और अपान वायु को स्थिर करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*