भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 435

हे इंद्र और सोम! तुम दोनों अग्नि के द्वारा तपाए हुए, फौलाद के बने हुए, संतापकारी एवं पुराने न होने वाले अपने आयुधों को अंतरिक्ष में घुमाओ तथा उन के द्वारा मानवभक्षी राक्षसों को समीपवर्ती प्रदेश में भेज दो, जहां जा कर वे मर जाएं. (५) इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मतिः कक्ष्याश्वेव वाजिना. यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपती इव जिन्वतम्.. (६) हे इंद्र तथा सोम! तुम दोनों हमारे द्वारा की गई स्तुति को उसी प्रकार सब ओर से स्वीकार करो, जिस प्रकार रस्सी शक्तिशाली घोड़ों को बांध लेती है. हम आह्वान के योग्य बुद्धि से तुम दोनों को प्रेरित करते हैं. हमारे मंत्र तुम्हें उसी प्रकार प्रसन्न करें, जिस प्रकार राजा चारणों के वचन सुन कर प्रसन्न होते हैं. (६) प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः. इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद् यो मा कदा चिदभिदासति द्रुहः.. (७) हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शक्तिशाली एवं गमन के साधन अश्वों के द्वारा हमारा स्मरण करते हुए आओ तथा आ कर हम से द्रोह करने वाले और विनाशकारी राक्षसों की हिंसा करो. हे इंद्र एवं सोम! बुरे कर्म करने वाले राक्षस को सुख न मिले. जो दुष्ट एक बार भी मुझे बाधा पहुंचाए, उसे तुम दुःख दो. (७) यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः. आप इव काशिना संगृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता.. (८) हे इंद्र! जो राक्षस सच्चे मन से कार्य करने वाले मुझ ब्राह्मण को शाप देता है और मुझ से असत्य वचन बोलता है, उस की बात अंजलि से निकल जाने वाले जल के समान सारहीन है. असत्य बोलने वाला वह स्वयं ही शून्य हो जाए अर्थात् नष्ट हो जाए. (८) ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्यै वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभिः. अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निर्ऋतेरुपस्थे.. (९) जो राक्षस मुझ सत्यवादी की इच्छानुसार निंदा करते हैं और जो राक्षस मुझ कल्याणकारी के यज्ञ कर्म को अन्नों के द्वारा दूषित करते हैं—इन दोनों प्रकार के राक्षसों को सोमदेव सर्प के लिए दे दें अथवा पाप देवता निर्ऋति की गोद में बैठा दें. (९) यो नो रसं दिप्सति पित्वो अग्ने अश्वानां गवां यस्तनूनाम्. रिपु स्तेन स्तेयकृद् दभ्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा ३ तना च.. (१०) हे अग्नि देव! जो राक्षस हमारे शरीर के सार को नष्ट करना चाहता है तथा जो हमारे घोड़ों, गायों और पुत्र, पौत्र आदि के शरीर के रस को दूषित करना चाहता है, इस प्रकार का शत्रु तस्कर और लुटेरा है. वह नष्ट हो जाए. वह अपने शरीर से और अपनी संतान से नष्ट हो ebook converter DEMO Watermarks*